ब्रेंट क्रूड 7% उछला, $90 के पार; मध्य पूर्व तनाव से तेल में आग
ईरान-अमेरिका संघर्ष बढ़ने से कच्चे तेल में तेजी; भारत की अर्थव्यवस्था और शेयर बाजार पर दबाव, महंगाई का खतरा बढ़ा
मध्य पूर्व में बढ़ते सैन्य तनाव के बीच ब्रेंट क्रूड की कीमतों में बुधवार को 7% की तेज उछाल दर्ज की गई और यह 90 डॉलर प्रति बैरल के स्तर से ऊपर निकल गया। अमेरिका और ईरान के बीच जारी संघर्ष तथा क्षेत्रीय हमलों की खबरों ने वैश्विक तेल बाजार में अस्थिरता पैदा कर दी है। भारत जैसे बड़े तेल आयातक देश पर इसका सीधा असर पड़ने की आशंका है।
कीमतों में उछाल की वजह
मध्य पूर्व में सैन्य गतिविधियां बढ़ने से आपूर्ति बाधित होने की आशंका ने बाजार में घबराहट पैदा कर दी। ब्रेंट क्रूड में आई यह तेजी पिछले कई हफ्तों में सबसे तेज मानी जा रही है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में जोखिम बढ़ने से निवेशक सुरक्षित विकल्पों की तरफ रुख कर रहे हैं, जबकि तेल की कीमतें ऊंची बनी हुई हैं।
विश्लेषकों का कहना है कि अगर तनाव और बढ़ा तो कीमतें और ऊपर जा सकती हैं। वहीं, राजनयिक प्रयासों से स्थिति में सुधार होने पर कीमतों में गिरावट भी संभव है।
भारतीय अर्थव्यवस्था पर असर
भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चा तेल आयात करता है। ब्रेंट क्रूड के 90 डॉलर से ऊपर जाने से देश के तेल आयात बिल में इजाफा होना तय है। इससे कई तरह के प्रभाव पड़ सकते हैं:
- मुद्रास्फीति: पेट्रोल-डीजल महंगे होने से परिवहन लागत बढ़ेगी, जिसका असर खाद्य पदार्थों और अन्य जरूरी वस्तुओं की कीमतों पर पड़ेगा।
- चालू खाता घाटा: ऊंचा आयात बिल चालू खाता घाटे को बढ़ा सकता है।
- रुपये पर दबाव: डॉलर की मांग बढ़ने से रुपये पर नकारात्मक असर पड़ सकता है।
- राजकोषीय दबाव: अगर सरकार ईंधन कीमतों को काबू में रखने के लिए करों में कटौती करती है तो राजस्व पर असर पड़ेगा।
आरबीआई और वित्त मंत्रालय स्थिति पर नजर रखे हुए हैं। पहले भी ऊंचे तेल भाव के समय सरकार ने कई उपाय किए थे।
शेयर बाजार पर प्रभाव
तेल की तेजी से भारतीय शेयर बाजार के अलग-अलग सेक्टर प्रभावित हो रहे हैं।
नकारात्मक असर वाले सेक्टर:
- तेल मार्केटिंग कंपनियां (OMCs): इंडियन ऑयल, भारत पेट्रोलियम और हिंदुस्तान पेट्रोलियम के मार्जिन पर दबाव बढ़ सकता है, खासकर अगर वे बढ़ी हुई लागत को पूरी तरह उपभोक्ताओं तक न पहुंचा पाएं।
- एविएशन: इंडिगो जैसी कंपनियों की ईंधन लागत बढ़ेगी।
- लॉजिस्टिक्स और टायर: परिवहन और टायर कंपनियों की लागत में इजाफा संभव है।
- ऑटोमोबाइल: ईंधन महंगा होने से मांग प्रभावित हो सकती है।
सकारात्मक असर वाले सेक्टर:
- अपस्ट्रीम कंपनियां: ओएनजीसी और ऑयल इंडिया को ऊंचे तेल भाव से फायदा हो सकता है, क्योंकि उनकी प्राप्तियां बढ़ती हैं।
- कुछ रिफाइनरीज: जटिल रिफाइनिंग मार्जिन वाले परिदृश्य में सीमित लाभ संभव है।
बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि अल्पावधि में अस्थिरता बनी रह सकती है। निवेशक वैश्विक खबरों और रुपये की चाल पर नजर रखेंगे।
सरकार और आरबीआई की संभावित भूमिका
सरकार के पास कई विकल्प हैं। इनमें एक्साइज ड्यूटी में समायोजन, रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार से आपूर्ति बढ़ाना और राजनयिक स्तर पर स्थिरता बनाए रखने के प्रयास शामिल हैं। आरबीआई मुद्रास्फीति और रुपये की अस्थिरता को काबू में रखने के लिए जरूरी कदम उठा सकता है।
ऊर्जा सुरक्षा को लेकर भारत लंबे समय से आपूर्ति स्रोतों में विविधता लाने की कोशिश कर रहा है। फिर भी, अल्पकालिक झटकों का असर पूरी तरह से बचा पाना मुश्किल होता है।
उपभोक्ताओं पर असर
अगर कच्चे तेल की कीमतें ऊंची बनी रहीं तो पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ सकते हैं। इससे आम आदमी की जेब पर सीधा असर पड़ेगा। महंगाई बढ़ने से ब्याज दरों पर भी दबाव बन सकता है, जिसका असर होम लोन और अन्य कर्जों पर पड़ सकता है।
आगे की चुनौतियां
मध्य पूर्व की स्थिति अभी अनिश्चित बनी हुई है। तनाव कम होने पर तेल कीमतें स्थिर हो सकती हैं, लेकिन लंबे संघर्ष की स्थिति में वैश्विक अर्थव्यवस्था पर असर गहरा सकता है। भारत के लिए यह जरूरी है कि वह अपनी ऊर्जा जरूरतों को सुरक्षित रखे और महंगाई को नियंत्रण में रखने के उपाय जारी रखे।
विशेषज्ञों का सुझाव है कि सरकार और उद्योग दोनों को ऊंचे तेल भाव के परिदृश्य के लिए तैयार रहना चाहिए। साथ ही, दीर्घकाल में नवीकरणीय ऊर्जा और घरेलू उत्पादन बढ़ाने के प्रयासों को और तेज करना होगा।
निष्कर्ष
ब्रेंट क्रूड का 7% उछलकर 90 डॉलर से ऊपर जाना मध्य पूर्व तनाव का सीधा नतीजा है। भारत जैसे आयात निर्भर देश पर इसका असर महंगाई, रुपये और शेयर बाजार के रूप में दिख रहा है। ओएमसी, एविएशन और लॉजिस्टिक्स सेक्टर दबाव में आ सकते हैं, जबकि ओएनजीसी जैसी कंपनियों को राहत मिल सकती है। आने वाले दिन वैश्विक घटनाक्रम और नीतिगत प्रतिक्रियाओं के लिहाज से महत्वपूर्ण साबित होंगे।