स्काईरूट एयरोस्पेस बना भारत का पहला स्पेसटेक यूनिकॉर्न: $1.1 बिलियन वैल्यूएशन, विक्रम-1 लॉन्च की उल्टी गिनती शुरू

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₹500 करोड़ की फंडिंग से दोगुनी वैल्यूएशन; हैदराबाद की स्टार्टअप ने निजी अंतरिक्ष क्षेत्र में रचा इतिहास, जून में हो सकता है देश का पहला प्राइवेट ऑर्बिटल मिशन

भारतीय स्पेसटेक क्षेत्र के इतिहास में आज एक नया अध्याय जुड़ गया। स्काईरूट एयरोस्पेस ने देश की पहली स्पेसटेक यूनिकॉर्न कंपनी बनने का गौरव हासिल कर लिया है। हैदराबाद स्थित इस स्टार्टअप ने हाल ही में $60 मिलियन (करीब ₹500-570 करोड़) की फंडिंग जुटाई है, जिसके बाद इसकी प्री-मनी वैल्यूएशन $1.1 बिलियन (लगभग ₹9,200-10,000 करोड़) पहुंच गई है।

यह फंडिंग राउंड Sherpalo Ventures (राम श्रीराम), सिंगापुर के सॉवरेन वेल्थ फंड GIC, BlackRock से जुड़े फंड्स, ग्रीनको ग्रुप के फाउंडर्स, Arkam Ventures और अन्य निवेशकों द्वारा को-लेड किया गया। स्काईरूट अब भारत के सबसे ज्यादा फंडेड स्पेसटेक स्टार्टअप्स में शामिल हो गया है।

विक्रम-1: भारत का पहला प्राइवेट ऑर्बिटल रॉकेट

स्काईरूट की सबसे बड़ी उपलब्धि इसकी विक्रम-1 रॉकेट है, जो भारत का पहला पूरी तरह से निजी रूप से डिजाइन और विकसित किया गया ऑर्बिटल लॉन्च व्हीकल है। कंपनी ने हाल ही में विक्रम-1 को श्रीहरिकोटा भेज दिया है और जून 2026 में इसके मेडेन लॉन्च की तैयारी तेजी से चल रही है।

विक्रम-1 एक छोटे सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल (SSLV) क्लास का रॉकेट है, जो 300-500 किलो पेलोड को लो अर्थ ऑर्बिट में ले जाने में सक्षम होगा। यह रॉकेट पूरी तरह से स्वदेशी तकनीक पर आधारित है और भारत की अंतरिक्ष क्षमता को नई ऊंचाई देगा।

स्काईरूट के को-फाउंडर और CEO पवन कुमार चंदाना और नागा भरत दाका ने कहा कि यह फंडिंग विक्रम-1 के लॉन्च, मैन्युफैक्चरिंग क्षमता बढ़ाने और विक्रम-2 प्रोजेक्ट पर खर्च की जाएगी।

एक दशक की यात्रा

2018 में स्थापित स्काईरूट एयरोस्पेस ने बहुत कम समय में उल्लेखनीय प्रगति की है। कंपनी ने अब तक कुल $160 मिलियन से ज्यादा की फंडिंग जुटा ली है। 2023 में इसकी वैल्यूएशन करीब $500-550 मिलियन थी, जो अब दोगुनी से ज्यादा हो गई है।

सरकार की IN-SPACe (Indian National Space Promotion and Authorisation Centre) नीति और निजी क्षेत्र को बढ़ावा देने के फैसलों ने स्काईरूट जैसे स्टार्टअप्स को पंख लगाए हैं। स्काईरूट ISRO के साथ भी सहयोग कर रहा है और श्रीहरिकोटा के सतीश धवन स्पेस सेंटर से लॉन्च की तैयारी कर रहा है।

भारतीय स्पेसटेक इकोसिस्टम पर असर

स्काईरूट का यूनिकॉर्न बनना पूरे भारतीय स्पेसटेक सेक्टर के लिए गेम चेंजर साबित हो सकता है। इससे:

  • और अधिक वैश्विक निवेश आकर्षित होगा
  • युवा इंजीनियरों और स्टार्टअप्स को प्रोत्साहन मिलेगा
  • भारत की सैटेलाइट लॉन्च क्षमता बढ़ेगी (जो अभी मुख्य रूप से ISRO पर निर्भर है)
  • रक्षा, संचार, मौसम पूर्वानुमान और वैज्ञानिक मिशनों के लिए स्वदेशी विकल्प तैयार होंगे

विश्लेषकों का कहना है कि भारत का स्पेसटेक बाजार 2030 तक $10-15 बिलियन का हो सकता है। स्काईरूट जैसी कंपनियां इस लक्ष्य को हासिल करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।

आगे की चुनौतियां

हालांकि सफलता के बावजूद चुनौतियां बाकी हैं। पहला सफल लॉन्च, लागत प्रतिस्पर्धा, वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला और नियामकीय मंजूरियां अभी भी महत्वपूर्ण हैं। स्काईरूट को विक्रम-1 के सफल लॉन्च के बाद विक्रम-2 (मीडियम लिफ्ट) और अन्य वेरिएंट पर काम तेज करना होगा।

स्काईरूट का यह सफर न सिर्फ एक कंपनी की कहानी है, बल्कि ‘आत्मनिर्भर भारत’ और ‘मेक इन इंडिया’ के सपने को साकार करने की प्रेरणा है। निजी क्षेत्र अब अंतरिक्ष में भी अपनी छाप छोड़ रहा है।

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