यूपीआई शुल्क से सालाना ₹15,000 करोड़ तक वसूली संभव, ज्यादातर लेनदेन फिर भी मुफ्त रहेंगे
प्रस्तावित 0.4% एमडीआर से व्यवस्था की लागत का बड़ा हिस्सा निकलेगा; 96% लेनदेन शुल्क से बाहर, बोझ मुख्यतः बड़े व्यापारियों पर
यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (यूपीआई) पर सीमित व्यापारी शुल्क लगाने से पहले साल में ₹13,000 से 15,000 करोड़ तक वसूली हो सकती है। यह रकम यूपीआई व्यवस्था की अनुमानित वार्षिक लागत करीब ₹21,000 करोड़ का बड़ा हिस्सा पूरा करेगी। फिर भी 96 प्रतिशत लेनदेन और लेनदेन मूल्य का 75 प्रतिशत शुल्क के दायरे से बाहर रहने का प्रस्ताव है।
शुल्क का ढांचा
चर्चा में 0.4 प्रतिशत मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) का मॉडल है। भुगतान उपयोगकर्ता से नहीं, व्यापारी से लिया जाएगा। एनपीसीआई के सीईओ दिलीप असबे के अनुसार छह साल के शून्य एमडीआर के बाद निवेश धीमा पड़ गया है। बिना राजस्व के पारिस्थितिकी तंत्र का विस्तार मुश्किल हो रहा है।
असबे का कहना है कि छोटे व्यापारियों और ग्राहकों पर बोझ बहुत कम रहेगा, क्योंकि एमडीआर पूल का करीब 80 प्रतिशत उन बड़ी कंपनियों से आएगा जिनकी सालाना डिजिटल वसूली ₹1,000 करोड़ से अधिक है। ये कंपनियां क्रेडिट कार्ड पर पहले से ऊंचा शुल्क देती हैं। एमडीआर मूल्य का केवल करीब 10 प्रतिशत उन व्यापारियों से आएगा जो अभी कार्ड स्वीकार नहीं करते।
शर्त यह है कि यह शुल्क ग्राहक पर न डाला जाए।
मुफ्त यूपीआई खत्म नहीं होगा
प्रस्ताव का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा यह है कि अधिकांश पर्सन-टू-पर्सन और छोटे मूल्य के भुगतान मुफ्त रहेंगे। 96 प्रतिशत लेनदेन संख्या के हिसाब से शुल्क से बाहर रहना यूपीआई की जन-पहचान को बचाए रखेगा। मूल्य के हिसाब से तीन-चौथाई हिस्सा भी मुक्त रहेगा। यानी दैनिक छोटे भुगतान—किराना, ऑटो, छोटे दुकानदार—के अनुभव में बड़ा बदलाव नहीं होना चाहिए।
बड़े प्लेटफॉर्म, ई-कॉमर्स और ऊंची डिजिटल वसूली वाले व्यापार पर शुल्क केंद्रित रहेगा। यही वर्ग कार्ड नेटवर्क पर पहले से लागत वहन करता है।
क्यों फिर शुल्क की बात
यूपीआई दुनिया के सबसे सफल रियल-टाइम भुगतान तंत्रों में है, लेकिन बैंकों, ऐप्स और इंफ्रास्ट्रक्चर पर लागत आती है। शून्य एमडीआर ने अपनाया तो खूब बढ़ाया, निवेश पर रिटर्न नहीं दिया। असबे के अनुसार शुल्क वापस लाने से बाजार के खिलाड़ी फिर निवेश करें और सेवाएं सुधारें।
पूरी ₹21,000 करोड़ लागत इस प्रस्ताव से नहीं निकलेगी। ₹13,000–15,000 करोड़ का लक्ष्य लागत का बड़ा हिस्सा वसूलने और विकास को प्रोत्साहित करने का है, न कि हर रुपये की भरपाई का।
ग्राहक और छोटे व्यापारी
सरकार पहले साफ कर चुकी है कि एमडीआर ग्राहक पर नहीं, व्यापारी पर लागू होता है। प्रस्ताव भी यही दोहराता है। छोटे व्यापारी अगर शुल्क दायरे से अधिकांशतः बाहर रहें तो दुकान स्तर पर प्रतिरोध कम रहेगा। जोखिम तब है जब बड़े व्यापारी लागत को कीमतों में छिपाकर डाल दें। निगरानी इसी बिंदु पर जरूरी होगी।
व्यवस्था के लिए संदेश
यूपीआई को स्थायी बनाने के लिए राजस्व का कोई स्रोत चाहिए। पूरा मुफ्त मॉडल लंबे समय तक बैंकों और फिनटेक की बैलेंस शीट पर टिका नहीं रह सकता। सीमित, बड़े व्यापारियों पर केंद्रित शुल्क एक मध्यम मार्ग है—जन उपयोग मुफ्त, बड़े वाणिज्यिक प्रवाह से लागत वसूली।
अगला कदम नीति का अंतिम रूप होगा: सीमा कितनी, दर कितनी, छूट किनको, और ग्राहक पर आगे बढ़ाने की मनाही कितनी सख्त। आरबीआई, वित्त मंत्रालय और एनपीसीआई के बीच सहमति से ही ढांचा लागू हो सकेगा।
निष्कर्ष
यूपीआई पर 0.4 प्रतिशत एमडीआर का प्रस्ताव सालाना ₹15,000 करोड़ तक ला सकता है और फिर भी ज्यादातर लेनदेन मुफ्त रख सकता है। यह छोटे भुगतान की आदत नहीं तोड़ेगा, बशर्ते शुल्क ग्राहक तक न पहुंचे। बड़े व्यापारियों से लागत निकालना व्यावहारिक रास्ता है। अब देखना होगा कि अंतिम नियम इसी संतुलन को कायम रखते हैं या नहीं।